रविवार, 3 मार्च 2013

ज्योतिष के राज सिंहासन पर - मंत्रों का आरोहण


हाइलाइट
- जन्म कुण्डली में बैठा कालजयी कालसर्प योग आपको इतिहास पुरूष बना सकता है?
-  एक क्षण के लिए प्रभु की खोज को मत भूलो
-  भीड़ में ऐसे रहो, जैसे अकेले हो
- जीवन एक खेल है, एक लीला है
- जीवन, एक उत्सव है। नम्रता से प्रारम्भ कर दिव्यता के भीतर झांक सको, तो झांकों।


पंडित पी एन भट्ट
अंतरराष्ट्रीय ज्योतिर्विद,
अंकशास्त्री एवं हस्तरेखा विशेषज्ञ
संचालक : एस्ट्रो रिसर्च सेंटर
जी-4/4,जीएडी कॉलोनी, गोपालगंज, सागर (मप्र)
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मनुष्य विधाता की सर्वश्रेष्ठ रचना है। महर्षि वेद व्यास ने इसके संबंध में कहा है, ''गुह्य ब्रह्म तदिदिं ब्रवीमि, नहि मानुषात् श्रेष्ठतरं हिं किंचित।'' अर्थात् मैं बड़े भेद की बात तुम्हें बताता हॅू, मनुष्य से बढ़कर संसार में कुछ नहीं है। जिन्दगी एक किताब है, जिसके हर पृष्ठ पर हमें नई बात लिखनी होती है। हर पृष्ठ एक सुबह है, एक शाम है। जो समझदार हैं, वे जिन्दगी की हर सुबह-शाम को सुन्दर बना लेते हैं।  ज्योतिषीय विवेचना हमारे भीतर की उन खासियतों को तलाश करने को प्रेरित करती हैं, जिन्हें जीवन की आपाधापी में हम कहीं छोड़ आए हैं और उनकी खोज हमारी जन्मकुण्डली में बैठे ग्रहों के माध्यम से उन्हें हम जानने का प्रयास करते हैं। सफर भले ही चुनौतीपूर्ण हो, किन्तु है तो रोचक। जन्म कुण्डली में बैठा कालजयी कालसर्प योग आपको इतिहास पुरूष बना सकता है? अनंत काल से कालसर्प योग की शरण स्थली में महान आध्यात्मिक संतों, आचार्यों, दार्शनिकों, धनकुबेरों, प्रख्यात राजनीतिज्ञों, कला शिल्पियों, यद्ध विशेषज्ञों, दुर्दान्त युद्धाओं तथा ऐतिहासिक पुरूषों की रोमांचकारी, रहस्यमयी गाथाएं विश्व साहित्य में यत्र-तत्र सर्वत्र बिखरी पड़ी हैं? इतिहास साक्षी है! कालजयी कालसर्प योग में जन्म लेने वाले आचार्य चाणक्य, आद्य गुरु शंकराचार्य, मुगल सम्राट अकबर महान, दुर्दान्त योद्धा चंगेज खां, तैमूरलंग, स्वामी विवेकानंद, जे.आर.डी. टाटा, शब्दों के सौदागर आचार्य रजनीश, पं. जवाहर लाल नेहरू, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, एडोल्फ हिटलर, पी.व्ही. नरसिम्हाराव, माधव राव सिंधिया, सद्दाम हुसैन, मुरारी बापू , धीरू भाई अंबानी आदि अनगिनत कालसर्प योगी दिव्य आत्माएं जन्म लेती रही हैं और लेती रहेंगी।  मन ही संशय है और इसीलिए द्वंद्व है। इनसे लड़ो मत, न ही इनसे तादात्म्य जोड़ों, क्योंकि ये दोनों असत्य हैं। ध्यान जारी रखो। झिझको नहीं, कूद जाओ। प्रतीक्षारत् रहो, उस दिव्य द्वार के खुलने की। आद्यगुरु शंकराचार्य की तरह परकाया प्रवेश की मानिद साहस के शरीर में प्रवेश कर जाओ, असीम और अज्ञात में प्रवेश के लिए। भीड़ में ऐसे रहो, जैसे अकेले हो।  एक क्षण के लिए प्रभु की खोज को मत भूलो। ध्यान, अन्तत: मन की ही मृत्यु है। ध्यान स्वयं का साक्षात्कार है। जीवन एक खेल है, एक लीला है और उसको ऐसा जानना ही धर्म है और उसको ऐसा जीना ही संन्यास है, त्याग है।  जीवन, एक उत्सव है। नम्रता से प्रारम्भ कर दिव्यता के भीतर झांक सको, तो झांकों। तुम मात्र साक्षी रहो, अज्ञात के रहस्य अपने आप खुल जायेंगे। साहस जुटाओ और अज्ञात में छलांग लगा जाओ। तुम कुछ भी नहीं खोओगे क्योंकि तुम्हारे पास कुछ है भी नहीं। विनम्रता, जीवन का आन्तरिक आभूषण है। ज्ञान के सागर में समय के हस्ताक्षर बनने हेतु मेरे शब्दों के साथ आप नर्तन कीजिए और उन्हीं क्षणों में आप ध्यानस्थ होकर मनन कीजिएगा। हो सकता है कालचक्रआपको तंत्र-मंत्र की वीथिकाओं में ले जाकर सिद्ध पुरूष बना दे?

परम्पराओं की अपनी सार्थकता है, अनुशरण परिस्थितिजन्य आवश्यक है। शिलाओं, वृक्षों, पत्तों और फिर विज्ञान ने वाचक और श्रमण परम्परा से हमें मुक्त करने का प्रयास किया, अक्षर परम्परा के जन्म से।  समूचे जीवनक्रम को भाग्य, संस्कार और संकल्प के त्रिकोण से सृष्टिचक्र की परिक्रमा करते हुए चेतना के स्वाभिमानी द्वार सदैव खुले रखें।  तंत्रशास्त्र न तो धर्मग्रन्थ है और न ही ये जातिवाद पर बल देते हैं। इनको और इनके पूजा-विधान की दीक्षा प्राप्त कर लेने के बाद गुरु की सहायता से तांत्रिकचर्या अर्थात् मंत्रों के रहस्यात्मक अथवा संस्कारयुक्त मातृकाओं और वर्णों के मंत्रों और संकेतों के यर्थात् प्रयोग पर आधृत है।
इसका मूल लक्ष्य यह है कि भगवान के पास पहुंंचने की अपेक्षा भगवान को ही पूजक के पास आने के लिए विवश किया जाय। तंत्र शास्त्र का दूसरा लक्ष्य है कि आराधक, आराध्य के साथ तादात्म्य स्थापित करने के उद्देश्य से भूत शुद्धि, प्राण-प्रतिष्ठा, न्यास और मुद्रा की सहायता से स्वयं देव स्वरूप हो जाता है।
''देवो भूत्वा देवं यजेत'' अर्थात् स्वयं देवरूप होकर वह अपने आराध्य को भी इसी विधि से मूर्ति, पट, मंत्र, मण्डल आदि में प्रतिष्ठित करता है। लंकेश रावण के क्रोध से भू-मण्डल कांपता था। वहीं उसने तंत्र के माध्यम से मंत्र द्वारा कुछ ऐसी सिद्धियां प्राप्त कर लीं थी, जिसकी वजह से वह आकाश में मुक्त रूप विचरण कर सकता था। इन्द्र, वायु, सूर्य, वरूण आदि देवों को मन चाहे ढंग़ से उपयोग करता। शनिदेव की दृष्टि बांध दी थी उसने अपनी मंत्र शक्ति से। वेदों की ऋचाओं पर अनुसंधान कर रावण ने अचूक शक्तियां प्राप्त कर ली थी किन्तु अन्त में काल के चक्र को मन ही मन प्रणाम करते हुए कहा कि मैं सब कुछ करने में समर्थ था, पर समय के मूल्य को, क्षण के महत्व को पहचान नहीं सका। समय की गणना का उसे पूरा-पूरा ज्ञान था। समय का ज्ञान तंत्र-मंत्र शास्त्र की एक दुर्लभ विद्या है। प्रकाण्ड विद्वान होते हुए भी अहंकारवश कालचक्र की गणना में चूक गया और यह दुर्लभ विद्या हमेशा-हमेशा के लिए पृथ्वी पर से लोप हो गई।  जीवन सम्भावनाओं पर चलता है। सुख क्षण भंगुर नहीं, शाश्वत् है। लौकिक नहीं, स्थायी और अलौकिक है। भगवत गीता के अनुसार - ''सुख आत्यंतिक यत्तद्बुद्धि ग्राह्यमतीन्द्रियम।'' अर्थात् सुख आत्यंतिक बुद्धि के द्वारा प्राप्त होता है, जो दो प्रकार का होता है, अविनाशी और क्षणिक। श्री हरि दोनों ही सुख को देने वाले हैं - योग और मोक्ष।

तंत्र वृह्द विज्ञान
तंत्र एक वृह्द विज्ञान है। यह शास्त्र सम्मत है। तंत्र के संबंध में कहा गया है - ''देवताओं में विष्णु वरिष्ठ एवं प्रधान देवता हैं। जलाशयों में समुद्र, नदियों में गंगा, पर्वतों में हिमालय, राजाओं में इन्द्र, देवियों में दुर्गा और चार वर्णों में ब्राह्मण प्रधान हैं।  इसी प्रकार सभी शास्त्रों में तंत्र शास्त्र सबसे उत्तम एवं प्रधान है। तंत्र शास्त्र सम्मत है, जैसे ऋग्वेद की हर ऋचाएं अपने आप में एक मंत्र हैं। दुनियां कितनी ही विकसित हो जाए - ब्रह्मांड के प्रभाव से यह मुक्त नहीं हो सकती। इसी का फल है कि दैवीय विपदाएं बिना किसी सूचना के आ धमकती है। इसलिए बहुत कुछ अस्वीकार करने की मुद्रा में भी बहुत कुछ स्वीकार करना पड़ता है।

तंत्र का दार्शनिक स्वरूप:
संसार में अनेक प्रकार की अदृश्य शक्तियां विद्यमान् हैं। उन्हें प्रत्यक्ष रूप में देखा नहीं जा सकता। देव-दैवीय शक्तियों के अलावा अन्य अदृश्य शक्तियां भी हैं, जो उच्चस्तरीय तो नहीं हैं, किन्तु अस्तित्व तो तंत्र, मंत्र जगत में स्वीकरा तो जाता ही है, उनमें भूत-प्रेत, शंकिनी, डंकनी, कर्ण डंकनी, पिशाचनी आदि हैं। सिद्ध होने पर संबंधित व्यक्ति व्याकुल हो उठते हैं, तोड़-फोड़ करने लगते हैं, ऊल-जलूल बकने लगते हैं। ऐसी सिद्धियां भूतकाल की घटनाओं को बताने में सक्षम होती हैं, पर कितनी। यह प्रश्न अनुत्तरित है? पर कुछ ऐसी महाविद्याएं और महाशक्तियां भी होती हैं जो सिद्ध होने पर साधक का तो उपकार करती ही हैं, उनके माध्यम से जनता का हित भी हो जाता है। अर्थात् लोक कल्याणकारी भाव भी इनमें निहित होता है।

साधक के द्वारा ही जप
बहुत से व्यक्ति किसी पण्डित को बुलाकर उसके द्वारा बगुलामुखी या श्रीविद्या का जप, पाठ, अनुष्ठान या हवन आदि करा लेते हैं, किन्तु उसका कोई फल नहीं होता। जब साधक उस महाविद्या के अनुकूल दीक्षा लेकर पूरे विधि विधान के साथ स्वयं जप करे अथवा किसी सिद्ध साधक के द्वारा जाप करावे।

सद्गुरु का साम्राज्य
पातंजल योग सूत्र (1/26) में ईश्वर को ही प्रथम गुरु माना गया है। भगवान ही जीव के उद्धारकर्ता हैं। जीव को माया-पंक से उठाकर परम पद में स्थापित करने की सामथ्र्य और किसी में नहीं। इसीलिए उन्हें ही सर्वत्र गुरु रूप में वर्णित किया जाता है।

लौकिक गुरु:
गुरु शब्द का साधारण अर्थ अज्ञान का हरण करने वाला। सभी ज्ञान यहीं से प्रवृत्त होते हैं। गुरु परम्परा के द्वारा ज्ञान प्रवाह निरन्तर चलता रहता है। गुरु ही ज्ञानदाता है।  तंत्र शास्त्र में तो गुरु को ईश्वर से भी ऊंचा स्थान दिया गया है। यह सब विचार लौकिक गुरु की दृष्टि से किया गया है। अद्वैतवादी दर्शन में गुरु, शिष्य और शिव में कोई भेद नहीं रहता।  शाक्त तंत्रों के अनुसार मां ही गुरु में भावना करने योग्य है। भावनोपनिषद् में सर्वकारण भूता शक्ति का गुरु रूप में वर्णन किया गया है।

स्मृति फलक
भारतीय मनीषियों ने शब्द को ही ब्रह्म रूप में स्वीकारा है। शब्दों का ही विशद स्वरूप मंत्र होते हैं। मंत्र शब्द का अर्थ है जिसके मनन करने से त्राण (रक्षा) हो। कल्प सूत्रों में मंत्रों की अगम्य शक्ति का वर्णन मिलता है।  तंत्र-मंत्र और यंत्रों में अपार शक्तियां छिपी हुई हैं। अक्सर यंत्र धारण करने वाले अथवा मंत्र का जाप करने वाले साधक को अभीष्ट फल की प्राप्ति नहीं होती। इसका कारण है उन्हें शास्त्रोक विधि-विधान का पालन करने का ज्ञान नहीं।  वेद, उपनिषदों, पुराणों एवं आध्यात्मिक ग्रंथों में अनेक प्रकार के मंत्रों का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में अनेक कल्याणकारी मंत्रों का वर्णन है।  आद्यगुरु शंकराचार्य ने उपासना के लिए मां भगवती का रूप चयन किया था। कोई भी व्यक्ति किसी वर्ण, धर्म सम्प्रदाय, निराकार अथवा साकारवादी हो, अपनी उपासना के लिए देवता का आस्थानुसार चयन कर सकता है।  भारतीय वेदों को प्राणी मात्र के लिए लिखा गया है। इसका हर शब्द मंत्र है, जो स्वयं सिद्ध है। जिनका ध्यान, तप, विधान कोई भी व्यक्ति सफलतापूर्वक कर सकता है। आवश्यक है तो मात्र समर्पित साधक की, जो अपराजेय संकल्पशक्ति के साथ, जिसकी चित्तवृत्ति शान्त हो, मन एकाग्र हो, शत-प्रतिशत श्रद्धा विश्वास हो, मंत्रों का उच्चारण शुद्ध हो, तो कल्याण भावना से किया गया अनुष्ठान अवश्य सफल होता है और साधक को अनंत शक्तियां प्राप्त हो सकती हैं।  अर्थववेद में उच्चपद, मनोकामना, विवाह, गर्भ, राजकर्म, शत्रु, रोग इत्यादि जीवन की समग्र आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु मंत्र-मणियों का समुद्र है, जिससे हर वर्ण, धर्म, सम्प्रदाय का व्यक्ति लाभान्वित हो सकता है।  अशुद्ध मंत्रों से किसी भी प्रकार कार्य सिद्ध नहीं हो सकता। वस्तुत: मंत्र साधना एक सूक्ष्म विज्ञान है। मंत्र जाप से उसके परमाणु, शब्द-स्कंद ब्रह्माण्ड में फैल जाते हैं, जिससे निमित्त मंत्र का अधिष्टायक देव यह जान लेता है कि अमुक साधक हमारा स्मरण कर रहा है और साधक की साधना जब पूरी हो जाती है, तो उसकी मनोवांछित इच्छापूर्ण करते हैं।  अर्थववेद में वर्णित हिरण्यमणी अर्थात लहसुनियां को स्वर्ण धातु की अंगूठी में मण्डित कर दूध से अभिमंत्रित करें फिर वर्णित मंत्रों से 108 बार हवन कर दाहिने हाथ की अनामिका (रिंग फिंगर) में धारण करने से आयु रक्षा, वर्चस्व वृद्धि तथा पराक्रम वृद्धि होगी।  आराधना आधारहीन हो तो भटकाती है। भावना या सम्मोहन का अर्थ है - जिसकी भावना करे, उसमें तन्मय या तल्लीन हो जाना। साधक केवल उसी भाव में लीन हो जाता है, शेष सारे विकल्प क्षीण हो जाते हैं। साधक को चाहिए अपनी शक्ति का नियोजन करके अपनी क्षमताओं को विकसित करे। ऐसा करने पर ही साधक आगम के दर्पण में अपना प्रतिबिम्ब देख सकेंगे।  वैदिक बन्धुत्व भावना के साथ हमें भगवान बुद्ध की करूणा तथा भगवान महावीर स्वामी की कठोर तपस्या को मिलाना होगा। साथ ही आगम और तंत्र शास्त्र में सिद्धों, नाथों, सन्तों और गुरुओं की वाणी में बताई गई समता दृष्टि का विस्तार करना होगा।  इसी प्रसंग में एक आलेख मेरे स्मृति पटल में घूम जाता है। जिसमें वर्षों पूर्व पढ़ा था, पण्डित मोतीलाल नेहरू को पुत्र न होने की व्यथा ने उन्हें इतना पीडि़त कर रखा था कि तंत्र-मंत्र, पूजा-पाठ, जिसने जो बताया उन्होंने वही किया। उन्हीं दिनों किसी मित्र ने उन्हें बताया कि एक सिद्ध साधु से आप मिल लें। शायद उनके आशीर्वाद से आपकी मनोकामना पूर्ण हो जाए।

करुणामय साधु
मोतीलाल नेहरू उन सिद्ध पुरूष की शरण में बड़े विनीत भाव से गए और अपनी मनोव्यथा से उन्हें अवगत कराया। पहुंचे हुए साधु बड़े करूणामय होते हैं, उन्होंने कहा तुम्हारे भाग्य में पुत्र का योग नहीं है परन्तु तुम्हारी भक्तिमय भावना को देखकर मैं ही तुम्हारे पुत्र के रूप में जन्म ले लूंगा।  ऐसा कहा जाता है कि कुछ ही दिनों बाद वे साधु मृत मिले और उनका जन्म हुआ पं. जवाहर लाल नेहरू के रूप में। साधु की साधुता तो पण्डित जवाहर लाल नेहरू में आजीवन बनी रही और शान्तिदूत के रूप में श्रद्धेय बनें हैं आज भी भारतीय जनमानस में ..। सिद्ध-संत पुरूष और गुरुओं का आशीर्वाद किस को कब किस रूप में मिल जाए, यह तो आपके कर्म पर निर्भर करता है, किन्तु उनका सम्मान सदैव बनाए रखें। रोकर, हंसकर, गिरकर, स्वीकार, अस्वीकार की संधियों के मध्य समझौते कर हम अपना व्यक्तित्व संवारते हैं और व्यक्तित्व को प्रतिभा मण्डल के अभेद्यद्वार से ऊपर ले जाकर यदि हम अजात शत्रु बनने का प्रयास करें, तो तांत्रिक शक्तियों को जगाना होगा।

ब्रह्म मुहूर्त क्या है?
 रत्नावली नामक ग्रंथ में रात्रि के अन्तिम याम (पहर) को, स्कंध पुराण में रात्रि के अन्तिम आधे याम को ब्रह्ममुहूर्त कहा गया है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण: आधुनिक चिकित्सा अनुसंधानों के अनुसार प्रात:काल 3 बजे से 5 बजे पीयूष (पीयूट्टरी) तथा पीनियत ग्रंथियों से अंत:स्त्राव विशेष स्त्रावित होते हैं। ये अंत:स्त्राव शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता का अभिवर्धन करते हैं तथा स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाले होते हैं।  ब्रह्ममुहूर्त आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण समय है। पूजा-पाठ से लेकर अध्ययन, मनन् का श्रेष्ठ समय स्वीकारा गया है।  'योगवसिष्ठ' में भगवान राम एवं उनके गुरु ब्रह्मऋषि वशिष्ठ जी का संवाद है। 'योग वशिष्ठ' के विषय में कहा गया है कि इसे समझने के लिए पहले चारों वेदों का अध्ययन, मनन् करें तब इस ग्रंथ के रहस्यात्मक तथ्यों को समझा जा सकता है।  मूलाधार यह है कि भगवान राम अपने गुरु वशिष्ठ जी से कहते हैं कि हे गुरुदेव, मुझ सरीखे राम और आप सरीखे गुरु क्या इस धारा पर पहले भी हुए हैं।  गुरु वशिष्ठ जी कहते हैं - हे राम! जिस प्रकार समुद्र में लहरें उठती हैं, मिटती हैं, उसी प्रकार आज से पूर्व इस धरा पर 14 राम और 14 वशिष्ठ जन्म ले चुके हैं। गुरु और शिष्य का यह संवाद ग्रंथ अद्भुत और पठनीय योग्य है।

षोडशोपचार पूजन विधि
आराधना में षोडशोपचार पूजन विधि से ही करनी चाहिए, तभी मंत्र शक्ति प्रभावी होती है, अन्यथा प्राणहीन मंत्र शव की स्थिति में होता है।  (1) आवाहन, (2) आसन, (3) पाद्य, (4) अध्र्य, (5) आचमन, (6) स्नान,   (7) वस्त्र (यज्ञोपवीज), (8) गंध, (9) अक्षत, (10) पुष्प, (11) धूप, (12) दीप, (13) नैवेद्य,   (14) पुनराचमन, (15) ताम्बूल, (16) दक्षिणा, प्रदक्षिणा और नीराजन आदि क्रम हैं। इसी आधार से किसी देव की पूजन करना चाहिए।  पूजन के पश्चात् देव/दैवीय शक्ति का मंत्र जाप किया जाता है। उसके तीन प्रकार हैं - (1) वाचिक, (2) उपांशु, (3)। मानसिक जिसमें मंत्र का उच्चारण सुनाई दे, वह वाचिक है। जिसमें जीभ और ओंठ हिलते रहें, सुनाई न दे, वह उपांशु है और जिसमें ओंठ बन्द रहें जीभ चिपकी रहे और जाप मन में होता रहे, वह मानस (मानसिक) है। इस मानसिक जाप के समय निरन्तर आराध्यदेव का नाम रहे। इसे सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

तांत्रिक साधना में ज्योतिष की उपादेयता:-
1. महाभारत के अनुशासन पर्व के 64वें अध्याय में 27 नक्षत्रों की सूची देकर बतलाया गया है कि किस नक्षत्र में दान देने से किस प्रकार का पुण्य मिलता है।
2. पारस्कर गृह्यसूत्र में उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, घनिष्ठा, उत्तराभाद्रपद, रेवती और अश्विनी नक्षत्र को विवाह नक्षत्र कहा है।
3. महर्षि वेद व्यास के अनुसार 13 दिनों का एक पक्ष तथा एक ही मास में तीन सूर्य एवं चन्द्र ग्रहण भयोत्पादक रहे तथा महाभारत युद्ध में 18 अक्षोणीय सेना में से मात्र पांच पाण्डव और गुरु कृपाचार्य, द्रोण पुत्र अश्वाथामा, कृतवर्मा तथा श्रीकृष्ण ही बचे थे, बाकी सब युद्ध में मारे गये। महाभारत यु़द्ध नक्षत्र की गति से प्रभावित रहा।
4. आचार्य चाणक्य (कौटिल्य) ने अर्थशास्त्र के दसवें प्रकरण में युद्ध विषयक शकुन, जय-पराजय द्योतक निमित्तों का वर्णन किया है?
5. संहिता का सबसे पहला ग्रंथ सन् 505 ई. में बराहमिहिर का बृह्द संहिता नामक ग्रंथ मिलता है। इसके पश्चात् नारद संहिता, रावण संहिता, वशिष्ठ संहिता, बसन्तराज शकुन, अद्भुत सागर आदि ग्रंथों की रचना हुई।
6. व्यक्ति की जन्म कुण्डली अथवा हस्त रेखाओं के माध्यम से आप जान सकते हैं कि साधक को अपने कार्य उद्देश्य में सफलता मिलेगी अथवा नहीं? यदि हां तो कब तक?
7. कुण्डली में पंचमेश (विद्या, साधना, संतान), भाग्येश (तकदीर), दशमेश (कर्म, राज्य, पिता) की ग्रहीय स्थितियां अनुकूल हों और हस्त रेखाओं में भाग्य रेखा और यश रेखा तथा वृहस्पति के पर्वत पर अन्त:ज्ञान रेखा और चतुर्भुज तथा हृदय रेखा और मस्तिष्क रेखा के मध्य रहस्यमय क्रास का चिन्ह हो, तो साधक की साधना चाहे वह मंत्र सिद्धि, नौकरी में, प्रतियोगी परीक्षा या चुनावी समर में विजयश्री वरण करने हेतु समर्पित भाव से की गई साधना सफल हो सकती है।
8. इसके पश्चात् ज्योतिष में किस मुहूर्त में कौन-सा कार्य करना चाहिए इसका शोधन किसी विद्वान ज्योतिषी के माध्यम से ही संभव है।
9. मुहूर्त का अर्थ है सही समय का चुनाव। किसी समय विशेष में किया गया कोई कार्य शीघ्र सफल हो जाता हे और कहीं कहीं बिघ्न बाधाएं साधक की साधना में सफलता को तिरोहित कर देती है।
10. ज्योतिष में मुहूर्तों की व्यापकता अत्यंत विस्तृत है। साधारणत: मुहूर्त के चुनाव में पंचांग की भूमिका सर्वोपरि है। पंचांग का अर्थ है - पांच अंग (1) तिथि, (2) वार, (3) नक्षत्र, (4) योग, (5) करण।

चन्द्रमा का महत्व
मुहूर्त में चन्द्रमा का महत्वपूर्ण स्थान है। यदि व्यक्ति की राशि से गोचर में चन्द्रमा चैथी, आठवीं, बारहवीं राशि में भ्रमण कर रहा होगा तो क्रमश: सुख की हानि, व्याधि-कष्ट तथा धन का, सम्मान का अथवा स्वास्थ्य का व्यय।

स्वप्न विज्ञान
ज्योतिष में स्वप्न विज्ञान भविष्य का सूचना तंत्र है। यदि आपने कोई अनुष्ठान किया है और उसका फल जानना चाहते हो तो एक सहज तांत्रिक प्रक्रिया है। निद्रा देवी का आवाहन किया जाता है। स्वप्न में कार्य की सिद्धी-असिद्धि संकेतात्मक भाषा में आपको मिल जायेगी।

स्वरोदय ज्ञान
इस विद्या के आदि अविष्कारक भगवान शिव हैं। इसलिए इसका नाम शिवस्वरोद्य हुआ। सभी प्रकार कार्यों में योग सिद्धि, स्वर सिद्धि तत्व साक्षात्कार एवं अमरत्व प्राप्ति के लिए स्वरोदय का ज्ञान परमावश्यक है। स्वर में ही वेद, स्वर में ही शास्त्र और स्वर में ही श्रेष्ठ गंधर्व विद्या (संगीत) तथा स्वर में ही सम्पूर्ण त्रिलोकी और स्वर ही आत्मस्वरूप हैं। स्वर के बल से ही शत्रु का हनन्, मित्र समागम, लक्ष्मी की उपलब्धि कीर्ति एवं सुख की प्राप्ति होगी। स्वर विज्ञान तांत्रिकों से लेकर महाज्ञानियों तक उनकी साधना सिद्धि के लिए अपूर्व निधि ज्ञान है। प्रत्येक व्यक्ति की नासिका में दो छिद्र होते हैं। दाहिने छिद्र से दक्षिण स्वर तथा बायें छिद्र से वाम स्वर निकलता है। दोनों छिद्रों से एक साथ स्वर (श्वांस) निकलने पर सुषुम्ना (कुण्डलिनी) नाड़ी का स्वर होता है। दोनों नाडिय़ों अर्थात् स्वर के चलने को विष के समान माना है।  ध्यान, धारणा, परमात्म चिन्तन, भजन, पूजन सुषुम्ना स्वर में करना उचित है। वाम स्वर में 20 कार्य यथा: शान्ति कार्य, मैत्री कर्म, प्रभु दर्शन, योगाभ्यास, दिव्य औषधि सेवन, रसायन कर्म, भूषण धारण, वस्त्र धारण, विवाह, दान, आश्रम प्रवेश, भवन निर्माण, जलाशय, बाग-बाटिका, यश, सम्मेलन, ग्राम का बसना (कालोनियों का निर्माण का शुभारम्भ), दूर यात्रा (दक्षिण या पश्चिम की), पानी पीना, लघुशंका जाना आदि कार्य करना उचित है।  दक्षिण स्वर में 20 कार्य यथा: कठिन (्क्रूर) कर्म, शास्त्राभ्यास, दीक्षा, संगीत, वाहन, व्यायाम, कसरत, यंत्र-तंत्र रचना, पर्वत या किले पर चढऩा, विषय भोग, युद्ध, पशु-पक्षी क्रय-विक्रय, काटना-छांटना, कठोर योगिक साधना, राज दर्शन (सत्ता से जुड़े व्यक्तियों से भेंट) विवाद (तर्क, बहस) किसी के समीप जाना, स्नान, भोजन, पत्रादि लेखन कार्य करना उचित है।  बाम स्वर अर्थात् चन्द्र स्वर और दक्षिण स्वर अर्थात् सूर्य स्वरों का अभ्यास करने वाले महान लाभ, इष्ट सिद्धि और विजयश्री को वरण करते हैं।  जब विपरीत स्वर चलता है, तब उसे बदलना पड़ता है। यदि दक्षिण का उदय करना हो तो बांया हाथ नीचे, दक्षिण हाथ ऊपर करके दाहिने करवट से लेटना चाहिए। यदि बाम स्वर का उदय करना हो तो दाहिना हाथ नीचे, बांया हाथ ऊपर करके बांयी करवट से लेटना चाहिए।  स्वर योग से रोगों का निवारण, मृत्यु से बचने के योग, दाम्पत्य जीवन में, गर्भाधान में स्वरों की महिमा, बांछित संतान की प्राप्ति, अष्ट सिद्धियों की प्राप्ति, सर्व ऐश्वर्य सिद्धियां, ब्रह्म ज्ञान और कुण्डलिनी जागरण आदि की प्राप्ति में स्वरोदय ज्ञान संभव। स्वर विज्ञान विस्तृत विज्ञान है, स्थानाभाव के कारण वर्णन सहज नहीं।
   
आचार्य रजनीश
इसी संदर्भ में आचार्य रजनीश के विवादित ग्रंथ ''सम्भोग से समाधि की ओर'' ने हड़कम्प मचा दिया था, तत्कालीन सामाजिक परिदृश्य में। किन्तु किसी ज्योतिषाचार्य या मनोवैज्ञानिक ने उस पुस्तक में छिपे रहस्यमय वैज्ञानिक और ज्योतिषीय मर्म को समझने या समझाने का प्रयास नहीं किया।  आईये! उस पुस्तक के रहस्यमय अर्थ को समझने का एक लघु प्रयास तो हम कर ही लें। सर्वप्रथम ज्योतिषीय पक्ष पर मैं अपने सुधि पाठकों का ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा। ज्योतिष के गणनापत्र अर्थात् पंचांग में तिथियों का विश्लेषण करते समय आचार्यों ने अग्निदग्धा, रिक्ता आदि तिथियों की व्याख्या की है। आचार्य रजनीश ने अपनी चमत्कृत भाषा में स्पष्ट किया है कि जिन क्षणों में सहवासरत रहते हैं, यदि उन क्षणों में अग्निदग्धा तिथियां होंगी, तो गर्भाधान की स्थिति में जो संतान जन्म लेगी, वह अतिक्रोधी, अराजक मानसिकता से प्रभावित होगी। इसी प्रकार रिक्ता आदि तिथियों में सहवास से गर्भाधान की स्थिति में जन्मी सन्तान चारित्रिक कमजोरी से प्रभावित रहेगी।  और थोड़े गहरे अर्थों में जाइये? संभोग के क्षणों में यदि दम्पत्ति समाधिस्थ अर्थात शुभ विचारों से प्रभावित रहेंगें, तो गर्भाधान की स्थिति में जन्म लेने वाली संतान लोक कल्याण करने वाली होगी, किन्तु उन क्षणों में उसको मिटाना, उससे बदला देना अर्थात् कुविचारों से युक्त होंगे तो गर्भाधान की स्थिति में जन्म लेने वाली संतान अपराधिक मानसिकता से जुड़ी संतान के आप जनक बनेंगे? पूर्व जन्म के पुण्य के परमाणुओं और कर्मरूपी आपके अद्म्य साहस की शौर्यता में यदि मांत्रिक शक्तियों का रसागम मिला दिया जाए तो विश्वामित्र, महात्मा गांधी, महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, स्वामी विवेकानंद सरीखी किसी महान् आत्मा के जनक बनने का गौरव आपको प्राप्त हो सकता है। आवश्यकता मात्र इतनी है कि आपके पारमार्थिक सोच के साथ सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की भावना आपकी जीवनशैली में रंग जाए।  ज्योतिषीय काल चक्र का विश्लेषण आपके विगत् और आगत का शब्द चित्र बना कर जीवन के सौन्दर्य बोध की परिभाषा लिख देता है।  मनुष्य की तेजस्वीयता और बलवती आकांक्षा आपको इतिहास पुरूष बना सकती है, बशर्ते जन्म कुण्डली के ग्रह योगों के साथ किसी अदृश्य शक्ति का आशीर्वाद रूपी रक्षा कवच आपका सुरक्षा कवच बना हो। फिर सिकन्दर बनो या चाणक्य या आदिगुरु शंकराचार्य अथवा नेपोलियन बोर्नापार्ट या गुरु नानक सरीखे युग पुरूष।

दुर्भाग्य के लिए दरवाजे नहीं खोलें
हार्वर्ड के विख्यात प्रोफेसर विलियम जेम्स ने कहा था ''जो कुछ हमें होना चाहिए था, उसकी तुलना में हम केवल अर्द्ध जाग्रत हैं। हम अपने शारीरिक और मानसिक साधनों के केवल एक अल्पांश का उपयोग कर रहे हैं। यदि मोटे तौर पर कहें तो कहना होगा कि मनुष्य अपनी सीमाओं के बहुत भीतर जीवन बिताता है। उसमें विविध प्रकार की अद्वितीय शक्तियां हैं, जिसका वह उपयोग नहीं कर पाता। लगभग 5 दशक पूर्व एक लेख मैंने पढ़ा था, उसमें इटली के वैज्ञानिक गेलविया (गैलेलियो नहीं) ने सन् 1770 में सिद्ध किया था कि प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में इतनी इलेक्ट्रिक ईल (विद्युत ऊर्जा) है कि वह पांच सेल की टार्च जला सकता है और मनुष्य के मस्तिष्क में इतनी इलेक्ट्रिक ईल (विद्युत ऊर्जा) है कि वह बड़े से बड़ा कारखाना चला सकता है। यदि इन दोनों विद्युत ऊर्जाओं को मिला दिया जाये तो अकल्पनीय शक्त्यिां पैदा कर सकता है, मानव अपनी ऊर्जाओं से।  इसी संदर्भ में रूस के एक वैज्ञानिक ने सिद्ध किया था कि प्राचीन साधक (तपस्वी ऋषि) अपनी इसी ऊर्जा शक्ति के बल पर हजारों मील दूर बैठे अपने साधक मित्र से भावनात्मक संदेशों का आदान-प्रदान कर लेते थे। जिसे हम आज की वैज्ञानिक भाषा में टेलीपैथी कहते हैं।  मेरा आज की युवा पीढ़ी से आग्रह है कि वह अपनी विद्युत ऊर्जाओं को इतनी विकसित करें, जो मानव कल्याण के लिए स्तुत्यनीय उदाहरण बन सकें।  खुश किस्मत लोगों को पहचाने, ताकि आप उनके साथ रहने का निर्णय ले सकें। बदकिस्मत लोगों को भी पहचाने, ताकि आप उनसे बच सकें। दुर्भाग्य आम तौर पर मूर्खता के कारण आता है और इसके शिकार लोगों से ज्यादा संक्रामक और कोई नहीं होता।  अपने दरवाजे को छोटे-से-छोटे दुर्भाग्य के लिए भी न खोलें, क्योंकि अगर आप ऐसा करते हैं, तो उसके पीछे-पीछे बहुत से दुर्भाग्य चले आयेंगे।  अन्त में मेरा सुधि पाठकों से अनुरोध है - बढ़ती हुई आपदाएं, विपदाएं और झंझावतों ने हमें भाग्यवादी बनने के लिए भले ही विवश कर दिया हो, किन्तु ज्योतिषी भूत-प्रेत बाधा, तंत्र-मंत्रों से लेश रत्नादि, विक्रय केन्द्र जो यंत्र-तंत्र सर्वत्र खुल गये, उनसे दूर रहिये। तंत्र-मंत्र यंत्र साधना में शक्ति है, स्वयं विधि विधान से पूजन करें, मां भगवती की कृपा से आपके जीवन में सुख रूपी पुष्प वर्षा हो सकती है। अपने विश्वास, सामथ्र्य को पहचानिये और साधक बन जाईए। पर ध्यान रहे अपने दायित्वों का निर्वाहन करते हुए ईश्वरीय साधना को करना चाहिए। आपकी कर्मशक्ति से भाग्य की देवी आपके द्वार पर अवश्य दस्तक देगी। आतुरता से कर्मशील रहते हुए प्रतीक्षारत रहिए।

प्रस्तुति - राजकुमार सोनी (पत्रकार), भोपाल